भगवद्गीता में सुख की प्राप्ति के लिए गहरा ज्ञान निहित है, जो हमें क्षणभंगुर सांसारिक सुखों से परे, शाश्वत आंतरिक आनंद की ओर मार्गदर्शन करता है। गीता यह स्पष्ट करती है कि सच्चा सुख इंद्रियों और बाहरी वस्तुओं से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि भीतर ही पाया जाता है।
आत्म-नियंत्रण और अनासक्ति के माध्यम से आंतरिक सुख की प्राप्ति पर बल देते हुए भगवान कृष्ण कहते हैं:
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् | स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते || 5.21
**अर्थात्:** जो पुरुष बाहरी विषयों में आसक्ति रहित है, वह आत्मा में ही सुख प्राप्त करता है। वह ब्रह्मयोग में स्थित आत्मा वाला पुरुष अविनाशी परमानंद को अनुभव करता है।
यह श्लोक बताता है कि वास्तविक सुख बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर खोजने से मिलता है, जब मन बाहरी संस्पर्शों से विरक्त हो जाता है।
जो योगी इस आंतरिक सुख को प्राप्त कर लेता है, उसके विषय में गीता कहती है:
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः | स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति || 5.24
**अर्थात्:** जो पुरुष भीतर ही सुख वाला है, भीतर ही रमण करने वाला है तथा जो भीतर ही ज्ञान वाला है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म को प्राप्त होता है।
यह श्लोक उस योगी की अवस्था का वर्णन करता है जिसकी प्रसन्नता, संतोष और ज्ञान सब कुछ भीतर से आता है, और वही ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
सुखों के प्रकार का वर्णन करते हुए, भगवान कृष्ण सर्वोच्च, सात्विक सुख की पहचान बताते हैं, जो अंतिम आनंद की ओर ले जाता है:
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् | तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् || 18.37
**अर्थात्:** जो सुख पहले विष के समान प्रतीत होता है (क्योंकि उसमें इंद्रियों का निग्रह करना पड़ता है), परन्तु परिणाम में अमृत के समान होता है, वह आत्म-विषयक बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होने वाला सात्विक सुख कहा गया है।
यह श्लोक हमें बताता है कि सच्चा और टिकाऊ सुख, जो सात्विक प्रकृति का होता है, प्रारंभिक कठिनाइयों (जैसे आत्म-नियंत्रण और आसक्ति त्याग) के बावजूद अंततः अमृत के समान स्थायी आनंद प्रदान करता है। यह आत्म-ज्ञान और निर्मल बुद्धि से उत्पन्न होता है।
सारांश में, गीता के अनुसार सुख की प्राप्ति बाहरी पदार्थों से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि, आत्म-नियंत्रण, आसक्ति का त्याग और अपनी आत्मा में रमण करने से होती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में सुख की प्रकृति और उसे प्राप्त करने के मार्ग पर कई महत्वपूर्ण श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमुख श्लोक उनके अर्थ सहित दिए गए हैं:
श्लोक (२.१४):
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
अर्थ: हे कुंतीपुत्र! इन्द्रियों के विषयों से संयोग ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाले हैं। वे आने-जाने वाले (अनित्य) हैं, इसलिए हे भारत! उन्हें सहन करो।
भाव: यह श्लोक बताता है कि सांसारिक सुख और दुःख स्थायी नहीं हैं। वे आते-जाते रहते हैं, इसलिए ज्ञानी पुरुष को उनसे विचलित नहीं होना चाहिए।
श्लोक (२.१५):
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
अर्थ: हे पुरुषश्रेष्ठ! जो धीर पुरुष सुख और दुःख में समान रहता है और इन (इन्द्रिय-विषयों) से विचलित नहीं होता, वह मोक्ष के योग्य होता है।
भाव: सच्चा सुख सुख-दुःख की परिस्थितियों से परे, समभाव में स्थित रहने से मिलता है।
श्लोक (५.२१):
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥
अर्थ: बाहरी विषयों में अनासक्त आत्मा वाला पुरुष आत्मा में जो सुख है, उसे पाता है। वह ब्रह्मयोग में युक्त आत्मा वाला अक्षय (कभी नष्ट न होने वाले) सुख का अनुभव करता है।
भाव: जब व्यक्ति बाहरी वस्तुओं में सुख खोजना बंद कर देता है और अपने भीतर स्थित आत्मा में आनंद पाता है, तो उसे अक्षय सुख की प्राप्ति होती है।
श्लोक (१८.३७):
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥
अर्थ: जो आरम्भ में विष के समान और परिणाम में अमृत के समान होता है, वह आत्मबुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न सुख सात्त्विक कहा गया है।
भाव: सच्चा सुख (सात्त्विक सुख) शुरुआत में कठिन लग सकता है (जैसे तपस्या या अनुशासन), लेकिन उसका परिणाम अमृत के समान मधुर और स्थायी होता है।
ये श्लोक हमें सिखाते हैं कि सच्चा और स्थायी सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने भीतर, समभाव में और धर्मानुसार कर्म करने में निहित है।