सबसे आवश्यक बात तो यह है कि हमें यह पता होना चाहिए कि क्या हम भी दुखी हैं । जब तक हमें इस बात की जानकारी नहीं होगी कि मेरे भीतर भी कोई दुख है तब तक हम उसके समाधान की तरफ कभी आगे नहीं बढ़ सकते। और देखिए क्या आपके तन और मन की स्थिति ऐसी नहीं है। अगर है तो उसके समाधान की बात पूछनी चाहिए। इन प्रश्नों का उत्तर कौन देगा?गीता इन प्रश्नों का उत्तर देती तो है पर उसे बतायेगा कौन।?
बिना किसी वजह के मन घबराता है
बेवजह किसी अनिष्ट की आशंका होती है
मैं बीमार हो जाऊंगा ऐसे मन में ख्याल आते हैं
किसी की याद आते ही गुस्सा आता है
पूजा करने के समय लगता है कब समाप्त होगा
किसी चीज के नहीं मिलने से मन परेशान रहता है
कहीं अच्छा नहीं लगता
किसी के द्वारा अपमान करने पर कई दिन तक कचोटता रहता है
शरीर के भीतर कोई ना कोई हलचल महसूस होती रहती है
अच्छी तरह से नींद नहीं आती है
मन हमेशा दुविधाओं में घिरा रहता है
कोई चीज बिगड़ न जाए, नष्ट न हो जाए, हमेशा चिंता बनी रहती है
इसके अलावा और भी कुछ अगर ऐसा आपके साथ भी होता है तो निश्चित मानिए आप भी दुख की स्थिति में हैं। लेकिन इस दुख की स्थिति को मनुष्य पार कर सकता है --गीता इसका समाधान बताती है। मनुष्य अपने कर्मों के लिए स्वयं ही उत्तरदाई है। अपने वर्तमान के कर्मों को ठीक करके पिछले कर्मों को भी ठीक कर सकता है। अंततः वह दुख समाप्त हो सकता है । किंतु यह स्वीकार करना आवश्यक है कि आपके भीतर भी दुख है। यदि है तो जुड़िए इससे हम आगे बताएंगे कि हम अपने पिछले कर्मों को कैसे जला सकते हैं और इस जीवन को सुंदर और दुख मुक्त बना सकते हैं।
भगवद्गीता के अनुसार, दुख मुक्ति का मूल आधार आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझना और इस संसार की नश्वरता व आसक्ति के कारणों को जानना है। श्री भगवान कृष्ण विभिन्न मार्गों का उपदेश देते हैं, जो मनुष्य को दुखों से पार पाने और परम शांति प्राप्त करने में सहायक होते हैं। दुख मुक्ति के प्रमुख उपाय और संबंधित श्लोक निम्नलिखित हैं:
1. आत्म-ज्ञान (आत्मा की अमरता का ज्ञान):
दुख का एक बड़ा कारण शरीर को ही आत्मा मानना और जन्म-मृत्यु, हानि-लाभ आदि में आसक्त होना है। गीता में आत्मा को अविनाशी और शरीर को नश्वर बताया गया है। इस ज्ञान से मृत्यु का भय और प्रियजनों के बिछड़ने का शोक समाप्त होता है, क्योंकि आत्मा न तो जन्म लेती है और न मरती है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः |
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||20
(यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्म लेती है और न मरती है; न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाली है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती।)
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि |
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ||22
(जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।)
2. निष्काम कर्मयोग (कर्मफल की आसक्ति का त्याग)
दुख का दूसरा मुख्य कारण कर्मों के फल की इच्छा और उसमें आसक्ति है। जब मनुष्य फल की इच्छा से कर्म करता है, तो इच्छा पूरी न होने पर क्रोध, निराशा और दुख होता है। निष्काम कर्मयोग यह सिखाता है कि हमें केवल कर्म करने का अधिकार है, उसके फल पर नहीं। इससे कर्म के बंधन से मुक्ति मिलती है और मन शांत रहता है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||47
(तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। अतः तू कर्मफल का हेतु मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो।)
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||48
(हे धनञ्जय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्म कर, क्योंकि समत्व ही योग कहलाता है।)
3. मन और इंद्रियों पर नियंत्रण (राग-द्वेष से मुक्ति):
इंद्रियों का विषयों से संपर्क सुख-दुख का अनुभव कराता है, और इन विषयों में आसक्ति ही कामना व क्रोध को जन्म देती है, जो दुख के मूल कारण हैं। मन और इंद्रियों को वश में करने से राग (आकर्षण) और द्वेष (विकर्षण) से मुक्ति मिलती है, जिससे शांति और प्रसन्नता प्राप्त होती है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते |
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ||62
(विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है; आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।)
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः |
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||63
(क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है, स्मृति भ्रष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि का नाश होने से पुरुष का पतन हो जाता है।)
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् |
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||64
(परन्तु अपने वश में की हुई इंद्रियों द्वारा राग-द्वेष से रहित होकर विषयों में विचरण करने वाला मन वाला पुरुष अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है।)
4. भक्तियोग और ईश्वर की शरण (सर्वोच्च समर्पण):
भगवान में अनन्य भक्ति और उनकी शरण ग्रहण करना दुख मुक्ति का परम उपाय है। जब मनुष्य अपने सभी कर्मों, मन और बुद्धि को ईश्वर को समर्पित कर देता है, तो वह सभी पापों और चिंताओं से मुक्त हो जाता है, क्योंकि ईश्वर स्वयं अपने भक्त का योगक्षेम वहन करते हैं और उसे मृत्यु-संसार-सागर से तार देते हैं।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||65
(मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरी पूजा कर और मुझे नमस्कार कर। ऐसा करने से तू मुझको ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मेरा प्रिय है।)
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||66
(सम्पूर्ण धर्मों (कर्तव्यों) को त्यागकर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।)
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् |
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ||7
(हे पार्थ! मुझमें चित्त लगाने वाले उन भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ।)
सारांश में, भगवद्गीता दुख से मुक्ति के लिए आत्म-ज्ञान, निष्काम कर्म, मन और इंद्रिय संयम, और परमेश्वर में अनन्य भक्ति व शरणागति जैसे मार्गों का उपदेश देती है। इन उपायों का अनुसरण करके मनुष्य जीवन के बंधनों और दुखों से मुक्त होकर परम शांति और मोक्ष को प्राप्त होता है।